सच हिमाचल ब्यूरो: मई 2025 में शिमला में हुए भीषण भूस्खलन को लेकर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने एक ऐसा रुख अपनाया है जिसने प्रभावित किसानों और जमीन मालिकों को हैरान कर दिया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में दाखिल अपने जवाब में NHAI ने इस तबाही को ‘दैवीय आपदा’ (Act of God) करार देते हुए कृषि भूमि के नुकसान का मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया है। प्राधिकरण का कहना है कि भारी बारिश और प्राकृतिक आपदा के लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
विकास की कीमत या कुदरत का कहर? NGT में आमने-सामने किसान और NHAI:
शिमला ग्रामीण तहसील के कुछ प्रभावित भूमि मालिकों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का सीधा आरोप है कि शकराल गांव से ढली (NH-5 कैथलीघाट-ढली खंड) तक चल रहे फोरलेन सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट में लापरवाही बरती गई। प्राधिकरण और उसकी कंस्ट्रक्शन कंपनी ने ढलान (slopes) को ठीक से मजबूत किए बिना ही भारी निर्माण कार्य और खुदाई जारी रखी, जिसके चलते पहाड़ धसके और उनकी उपजाऊ कृषि भूमि पूरी तरह तबाह हो गई। किसानों ने मांग की थी कि एनएचएआई और उसकी निर्माण एजेंसियों की इस चूक के कारण उन्हें पर्यावरण और संपत्ति के नुकसान का उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
‘भारी बारिश ने मचाई तबाही, निर्माण कार्य से कोई लेना-देना नहीं’ — NHAI:
इस याचिका के जवाब में एनएचएआई ने जो हलफनामा दायर किया है, वह प्रभावितों को चुभने वाला है। प्राधिकरण ने तर्क दिया है कि मई 2025 के अंत में पूरे हिमाचल प्रदेश में अप्रत्याशित और भारी बारिश हुई थी, जिससे उन इलाकों में भी बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुए जहां कोई निर्माण कार्य नहीं चल रहा था। मौसम विभाग (IMD) की रिपोर्ट और राज्य सरकार की आपदा घोषणा का हवाला देते हुए NHAI ने कहा कि 25 मई को ढलान को सहारा देने वाली दीवार का टूटना पूरी तरह से एक प्राकृतिक और असाधारण घटना थी, जिसे रोकना या जिसका अनुमान लगाना मुमकिन नहीं था। जब गलती प्रकृति की है, तो इसके लिए प्राधिकरण को जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता।
सेब के पेड़ों और नुकसान के आंकड़ों पर भी छिड़ी जंग:
मुआवजे की रकम को लेकर भी NHAI और स्थानीय प्रशासन के बीच ठन गई है। शिमला ग्रामीण के उपमंडलाधिकारी (SDM) की रिपोर्ट में एक भूखंड पर करीब 440 पेड़ों के नुकसान और 32.3 लाख रुपये से अधिक के दावे की बात कही गई थी। एनएचएआई और उसकी प्रोजेक्ट कंपनी ‘मैसर्स गावर शिमला हाईवे प्राइवेट लिमिटेड’ ने इस आकलन को पूरी तरह गलत और बढ़ा-चढ़ाकर बताया है। उनका दावा है कि प्रभावित जमीन पर सेब के महज 40 पेड़ थे, इसलिए बागवानी विभाग को मौके पर जाकर दोबारा जांच करनी चाहिए।
भविष्य के मुआवजे का भरोसा, पर वर्तमान जिम्मेदारी से इनकार:
हालांकि, एनएचएआई ने यह स्पष्ट किया है कि जिस जमीन को नुकसान पहुंचा है, वह पहले से ही राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम के तहत प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित की जा रही है और इस साल 15 जनवरी को इसकी अधिसूचना भी जारी हो चुकी है। प्राधिकरण का कहना है कि जमीन अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद नियमानुसार मुआवजा तो दिया जाएगा, लेकिन ‘पर्यावरणीय नुकसान’ या लापरवाही के एवज में कोई अतिरिक्त हर्जाना नहीं मिलेगा। एनएचएआई के मुताबिक, याचिकाकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं कि पर्यावरण या वन मंजूरी के नियमों का कोई उल्लंघन हुआ है।
Content Writer- Vijay
