हिमाचल प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन-यापन करने वाले परिवारों के लिए सरकार द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों ने प्रदेश की राजनीति और ग्रामीण अंचलों में हलचल तेज कर दी है। ग्रामीण विकास विभाग द्वारा BPL चयन प्रक्रिया में किए गए पाँचवें संशोधन के तहत अब आवेदन के लिए मनरेगा में पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान कम से कम 5 दिन का कार्य करना अनिवार्य कर दिया गया है।
सरकार के इस फैसले को प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता लाने का कदम बताया जा रहा है, लेकिन धरातल पर इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया है। आलोचकों का तर्क है कि यह शर्त उन बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए अन्यायपूर्ण है, जो मनरेगा जैसे कठिन शारीरिक श्रम करने में समर्थ नहीं हैं।
भाजपा विधायक बिक्रम ठाकुर ने इस निर्णय को ‘जनविरोधी’ करार देते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि सुक्खू सरकार एक ओर रोजगार के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं के लिए ऐसी जटिल शर्तें थोपकर गरीबों की मुश्किलें बढ़ा रही है। विधायक ने सवाल उठाया कि बार-बार नियमों में बदलाव (100 दिन से घटाकर अब 5 दिन की शर्त) सरकार की अस्थिर नीति को दर्शाता है। साथ ही, 18 अप्रैल 2026 तक आवेदन और 21 अप्रैल तक अंतिम सूची जारी करने की जल्दबाजी पर भी आपत्ति जताई गई है। विपक्ष ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस ‘तुगलकी फरमान’ को वापस नहीं लिया गया, तो प्रदेश भर में सरकार के खिलाफ बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। यह नया विवाद अब सीधे तौर पर गरीब परिवारों के मौलिक अधिकारों और सरकारी तंत्र की जटिलताओं के बीच की लड़ाई बन गया है।
By Vijay
