शिमला: हिमाचल प्रदेश के सेब बेल्ट कहे जाने वाले शिमला जिले के जुब्बल और कोटखाई (देवरिघाट और बारेनघाट) क्षेत्रों में ओलों से फसलों को बचाने के लिए लगाई गई एंटी-हेल गन (ओला रोधक बंदूकों) को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी मोड़ सामने आया है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन सी नेगी की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर गंभीर संज्ञान लेते हुए इन गनों के इस्तेमाल पर तुरंत प्रभाव से अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत का यह सख्त आदेश किसी एक क्षेत्र के लिए नहीं, बल्कि सरकारी विभागों के साथ-साथ निजी तौर पर बगीचों में लगाई गई सभी एंटी-हेल गन पर समान रूप से लागू होगा। कोर्ट ने प्रदेश सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह निजी ऑपरेटरों द्वारा भी इनका संचालन तुरंत बंद करवाना सुनिश्चित करे।
यह कानूनी कार्रवाई स्थानीय बागवानों द्वारा उठाई गई उन चिंताओं के बाद सामने आई है, जिसमें दावा किया गया था कि इन गनों के चलने से पर्यावरण और मौसम का संतुलन बिगड़ रहा है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि एंटी-हेल गन से निकलने वाली बेहद तीव्र शॉक वेव्स (तरंगें) बादलों को तितर-बितर कर देती हैं, जिससे वे बादल पड़ोसी क्षेत्रों जैसे बागी, रत्नाड़ी, रोहड़ू और कुमारसैन की तरफ मुड़ जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, इन आस-पास के इलाकों में अप्रत्याशित रूप से अत्यधिक भारी बारिश, ओलावृष्टि और यहाँ तक कि बादल फटने जैसी भयानक प्राकृतिक आपदाओं का खतरा कई गुना बढ़ गया है, जिससे वहां के किसानों और बागवानों को हर साल करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अदालत ने इस मामले की वैज्ञानिक गहराई को समझते हुए डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी (सोलन) को भी मामले में प्रतिवादी बनाया है, क्योंकि विश्वविद्यालय इन गनों के प्रभाव पर एक विस्तृत स्टडी कर रहा है। चूंकि इस वैज्ञानिक शोध को पूरा होने में लगभग 4 साल का लंबा समय लगने की बात कही गई है, इसलिए हाईकोर्ट ने किसी भी बड़े नुकसान से बचने के लिए कम से कम एक साल की अवधि या अंतिम वैज्ञानिक रिपोर्ट आने तक इन गनों के संचालन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का अंतरिम फैसला सुनाया है। इस दौरान, कोर्ट ने राज्य सरकार को यह मॉनिटर करने का निर्देश दिया है कि क्या प्रतिबंध के बाद पड़ोसी क्षेत्रों में भारी बारिश और आपदाओं में कमी आई है। साथ ही, सरकार से मैक्सिको और रोमानिया जैसे देशों की वैश्विक रिपोर्ट्स का अध्ययन कर एक व्यापक जवाब मांगा गया है। इस बेहद संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई अब 8 दिसंबर 2026 को होगी।
Content Editor- Chanchala
