हिमाचल प्रदेश को वर्ष 2027 तक आत्मनिर्भर बनाने के संकल्प के साथ मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने एक क्रांतिकारी ‘ग्रीन टू गोल्ड’ पहल की शुरुआत की है। इस ऐतिहासिक कदम के तहत राज्य सरकार ने औद्योगिक भांग की खेती को कानूनी मान्यता देकर इसे एक विनियमित उद्योग के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री का लक्ष्य भांग की नकारात्मक छवि को बदलकर इसे औषधीय और औद्योगिक संपदा के रूप में स्थापित करना है। 24 जनवरी 2025 को कैबिनेट द्वारा स्वीकृत इस पायलट प्रोजेक्ट के माध्यम से राज्य के राजस्व में सालाना 500 से 2000 करोड़ रुपये की वृद्धि होने का अनुमान है, जो हिमाचल को 2032 तक देश का सबसे समृद्ध राज्य बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता इसका वैज्ञानिक और संतुलित दृष्टिकोण है। औद्योगिक उपयोग के लिए उगाई जाने वाली भांग में नशीले तत्व (THC) की मात्रा को 0.3% से कम रखा जाएगा, ताकि इसका दुरुपयोग न हो सके। इससे प्राप्त उच्च गुणवत्ता वाले फाइबर और बीजों का उपयोग टेक्सटाइल, बायो-प्लास्टिक, कागज, सौंदर्य प्रसाधन और दवाओं जैसे पर्यावरण के अनुकूल उद्योगों में किया जाएगा। पालमपुर और नौणी स्थित कृषि विश्वविद्यालय कम THC वाले उन्नत बीजों को विकसित करने की जिम्मेदारी संभालेंगे, जिससे किसानों को आधुनिक और टिकाऊ फसल का विकल्प मिलेगा।
यह पहल न केवल अर्थव्यवस्था के लिए बल्कि किसानों की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है। भांग एक ऐसी कठोर फसल है जिसे पारंपरिक फसलों के मुकाबले 50% कम पानी की आवश्यकता होती है और इसे जंगली जानवरों से भी कोई खतरा नहीं होता। सरकार की इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य नशा माफिया के प्रभाव को खत्म कर प्राकृतिक संसाधनों का सीधा लाभ किसानों और सरकारी खजाने तक पहुँचाना है। राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी की अध्यक्षता वाली कमेटी के अध्ययन पर आधारित यह पहल हिमाचल को वैश्विक ‘बायो-इकॉनोमी’ का केंद्र बनाने और युवाओं के लिए स्टार्टअप के नए द्वार खोलने की क्षमता रखती है।
By Dhruv Sharma
