सच हिमाचल ब्यूरो: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने कर्ज के मामलों में गारंटर की भूमिका को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। अदालत ने एक लोन डिफॉल्ट मामले की सुनवाई के दौरान अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि सामान्य परिस्थितियों में गारंटर की जिम्मेदारी मुख्य कर्जदार के बिल्कुल बराबर (Co-extensive) होती है। अदालत ने साफ किया कि अगर कोई मुख्य कर्जदार बैंक का लोन चुकाने में असमर्थ या असफल रहता है, तो बैंक के लिए यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि वह गारंटर के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले मुख्य कर्जदार से वसूली के सभी कानूनी और व्यावहारिक रास्ते खत्म करे। बैंक अपनी सुविधा और जरूरत के हिसाब से सीधे गारंटर की संपत्ति से भी लोन की बकाया राशि वसूल करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
यह पूरा मामला कांगड़ा सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक से जुड़ा हुआ है, जिसने अखिल स्टील ट्रेडर्स और उनके लोन गारंटरों से करीब 10.99 लाख रुपये की बकाया राशि वसूल करने के लिए एक मुकदमा दायर किया था। इस मामले में साल 2019 में अदालत ने बैंक के पक्ष में डिक्री (फैसला) सुनाई थी। इसके बाद जब मुख्य कर्जदार से राशि नहीं मिली, तो बैंक ने कानूनी प्रक्रिया के तहत गारंटरों की संपत्ति की नीलामी और बिक्री का वारंट जारी करवा दिया। गारंटरों ने बैंक की इस सीधी कार्रवाई को अनुचित बताते हुए अदालत में चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को सिरे से खारिज कर दिया और बैंक द्वारा की गई कुर्की व बिक्री की कार्रवाई को पूरी तरह वैध और सही ठहराया।
यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी और सबक है जो बिना सोचे-समझे किसी के लोन के दस्तावेजों पर गारंटर के रूप में हस्ताक्षर कर देते हैं। भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 128 के तहत यह स्पष्ट है कि गारंटर बनना महज एक औपचारिक गवाही नहीं, बल्कि कर्ज की पूरी अदायगी की कानूनी गारंटी है। इस निर्णय से साफ है कि यदि मुख्य देनदार डिफॉल्ट करता है, तो बैंक बिना वक्त गंवाए सीधे गारंटर को दबोच सकता है और उसकी जमा-पूंजी या अचल संपत्ति बेचकर अपना नुकसान पूरा कर सकता है।
Content Editor- Mahima
