हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने राज्य सरकार के उस प्रस्तावित फैसले पर असहमति जताई है, जिसमें नशा तस्करी (चिट्टा) में शामिल लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की बात कही गई थी। राज्यपाल का तर्क है कि चुनाव लड़ने का अधिकार एक संवैधानिक प्रक्रिया है और किसी को भी बिना ठोस कानूनी आधार या अदालत के फैसले के इस अधिकार से वंचित करना लोकतांत्रिक मर्यादा के खिलाफ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि नशा माफिया के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन कानून बनाने की प्रक्रिया संविधान के दायरे में रहनी चाहिए ताकि वह भविष्य में अदालती चुनौतियों का सामना कर सके।
राज्यपाल के अनुसार, केवल एफआईआर (FIR) दर्ज होने या आरोपों के आधार पर किसी को चुनाव लड़ने से रोकना कानूनी रूप से टिक नहीं पाएगा। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया कि नशा मुक्ति के लिए सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठाए जाएं, लेकिन चुनावी नियमों में बदलाव करते समय संवैधानिक प्रावधानों का ध्यान रखना अनिवार्य है। इस बयान के बाद प्रदेश में नशे के खिलाफ लड़ाई और कानूनी अधिकारों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है।
By Dhruv Sharma
