सिरमौर के हरिपुरधार में हुआ बस हादसा महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि लापरवाही की जीती-जागती कहानी है। क्षेत्रीय अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे घायलों ने जो खुलासे किए हैं, उन्हें सुनकर रूह कांप जाएगी। चश्मदीदों का दावा है कि जब बस शिमला से चली थी, तभी से उसके टायरों और पट्टों से अजीबोगरीब ‘टक-टक’ की आवाजें आ रही थीं। कंडक्टर ने रास्ते में कई बार ड्राइवर से ग्रीस कम होने और खराबी का जिक्र भी किया, लेकिन इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि हरिपुरधार से चंद कदम पहले बस अनियंत्रित होकर खाई में जा गिरी। यात्रियों ने बताया कि बस ने जैसे ही पलटा खाया, उसकी छत उखड़कर अलग हो गई और सवारियां इधर-उधर पत्थर की तरह बिखर गईं। माघी त्योहार की खुशियां चंद सेकंड में चीख-पुकार और मातम में तब्दील हो गईं।हादसे के बाद प्रशासन की एक और शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। घायलों का कहना है कि हरिपुरधार और राजगढ़ जैसे अस्पतालों में प्राथमिक उपचार के नाम पर केवल ‘पेनकिलर’ इंजेक्शन उपलब्ध थे। पर्याप्त दवाइयां और सुविधाएं न होने के कारण घायलों को घंटों दर्द से तड़पना पड़ा। स्थानीय लोगों ने व्यवस्था पर गुस्सा जाहिर करते हुए बताया कि कुपवी क्षेत्र की 15 पंचायतों की 30 हजार आबादी भगवान भरोसे है। सरकारी बसें कब आती हैं और कब नहीं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता, जिससे लोग इन खटारा निजी बसों में जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं। संकरी सड़कें और त्योहारों के समय अतिरिक्त बसों का अभाव इस मार्ग को ‘डेथ जोन’ बना रहा है। आज अस्पताल के वार्डों में अपनों की तलाश में भटकते परिजनों की आंखों में केवल आंसू और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश है।
By Dhruv Sharma
