हिमाचल प्रदेश की राजनीति में वर्तमान में एक बड़ा विवाद गरमाया हुआ है। मामला राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग में मोनिता चौहान की नियुक्ति से जुड़ा है। इस नियुक्ति ने सुक्खू सरकार को विपक्ष और सामाजिक संगठनों के निशाने पर खड़ा कर दिया है। विवाद का मुख्य कारण यह है कि जिस महिला को बच्चों के अधिकारों की रक्षा का जिम्मा सौंपा गया है, उनके खिलाफ स्वयं हाई कोर्ट में एक गंभीर आपराधिक मामला (क्रिमिनल अपील नंबर 466/2025) लंबित है।
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, मोनिता चौहान को इस मामले में ₹50,000 के निजी मुचलके पर राहत मिली हुई है और कोर्ट ने उनके बिना अनुमति देश छोड़ने पर भी रोक लगाई है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकार को इस केस की जानकारी नहीं थी या फिर किसी राजनीतिक दबाव के चलते इस आपराधिक पृष्ठभूमि को नजरअंदाज किया गया? सूत्रों के हवाले से मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार सुनील बिट्टू की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं।
सामाजिक संगठनों और विपक्ष का मानना है कि बच्चों जैसी संवेदनशील संस्था में ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति नैतिक रूप से गलत है। फिलहाल, जनता और विपक्षी दल सरकार से स्पष्टीकरण या मोनिता चौहान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं, ताकि संस्था की विश्वसनीयता बनी रहे। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सुक्खू सरकार इस बढ़ते दबाव के बीच क्या कदम उठाती है।
By Dhruv Sharma
